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Navneet Srivastava, Jagran


Year of Exp: 9 year years

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अयोध्या में भाजपा को मिला वनवास

Posted On: 7 Mar, 2012  
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आखिर किसे बचा रही है कांग्रेस और केंद्र सरकार

Posted On: 4 Jun, 2011  
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अद्भुत, हर सड़क होली और दिवाली

Posted On: 3 Apr, 2011  
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तो क्या संसद से भी उतार देंगे तिरंगा…?

Posted On: 29 Jan, 2011  
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कश्मीर… लाल चौक या दलाल चौक ?

Posted On: 24 Jan, 2011  
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कौन ज्यादा ताकतवर? बिग बास या फिर सरकार..?

Posted On: 17 Nov, 2010  
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……. अब न हो और कोई अयोध्या

Posted On: 30 Sep, 2010  
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कौन टालना चाहता है फैसला..?

Posted On: 23 Sep, 2010  
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…… साम्प्रदायिक धर्मनिरपेक्षता

Posted On: 20 Sep, 2010  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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इंतजार में अयोध्या……………

Posted On: 14 Sep, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

नवनीत जी बहुत ही सही बात कही आपने आखिर उन महा पुरुषो को क्या दिक्कते आई होंगी हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते क्योकि तबतो मिडिया भी इतना शशक्त नहीं था जो शशको के जुल्मो को दिखा सके.. मै भी यही सोच रहा था की गाँधी के देश में सत्याग्रहियों के साथ ऐसा सलूक चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाला कृत्य है कांग्रेस के लिए .. आखिर किसे बचाया जा रहा है किसके लिए बचाया जा रहा है.. ? वह कौन है जो दिग्विजय सिंह, कपिल सिब्बल जैसे कुतर्की और चापलूस लोगो को आगे करके लोकतंत्र को तहस नहस करने पर तुला है .. इनके तर्क किसी के पल्ले नहीं पड़ते .. रामदेव और देश का हर आम व्यक्ति मजबूत हुआ है ..सुखद तथ्य ये है की रामदेव ने जो दृढ़ता दिखाई है वह आम व्यक्ति में जोश भरने वाली है ..एक व्यक्ति किस तरह अडिग होकर पूरी व्यवस्था को चुनौती दे रहा है ... और वह भी पूर्ण शांतिपूर्ण तरीके से .. यह सब देखकर सत्याग्रह और अहिंसा की शक्ति पर सबका विश्वाश बढ़ा है .

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

प्रणाम भैया संसद से राष्ट्रध्वज उतरने की तो बात छोडिये मुझे तो ये लगता है कि अगर कांग्रेस के हाथ में सत्ता रही तो आने वाले दिनों में देश में कही भी हमारे राष्ट्रध्वज के नामोनिशान नहीं मिलेंगे!!कमी सरकार में नहीं हम आम लोगो में है!!!आज हर एक आदमी रोजमर्रा कि जिंदगी से जूझ रहा है!!!किसी को नौकरी नहीं मिल रही तो कोई अपनी नौकरी से परेशान है!,कोई घर से परेशान,तो कोई पडोसी से!!किसको फ़िक्र है देश कि??जब चुनाव आता है तो कोई अपनी जाति वालों को वोट देता है तो कोई अपने इलाके के रसूखदार नेता को!!या फिर किस पार्टी से कितना मिल जायेगा ??ये देख के वोट देता है!!या फिर वोट देकर सिर्फ छुट्टी का आनंद लेते है!!तो कमी किसमे है सरकार में या हम में जो कि सरकार को चुनते है ??कमी हमारी है जो हम सही सरकार का चुनाव नहीं करते!फिर बाद में चिल्लाते है कि राष्ट्रध्वज लाल चौक पर नहीं फहराने दिया गया!!या फिर संसद पर से उतर जायेगा??माफ़ कीजिगा नवनीत भैया मै आपके जज्बात कि क़द्र करता हूँ और कहना चाहता हूँ कि जब हमारा देश आजाद हुआ था तब के लोगो में और आज के लोगो में बहुत फर्क है!!तब के लोग जातिपांति में विश्वास नहीं करते थे,एक साथ उठते बैठते थे,एक साथ खाते थे और उन्हें घर कि नहीं देश कि चिंता थी!!लेकिन आज के लोगो को देश कि नहीं घर कि चिंता है!!जिन महापुरुषों के कारण हमें आजादी मिली है वो हँसते-हँसते तिरंगे के सम्मान के लिए अपनी जान तक दे देते थे!!आज के लोग तो ऐसे है कि अगर उनके पडोसी को कोई बाहर का आ के मार रहा हो तो अपनी खिड़की और दरवाजे बंद कर लेते है!!कहते है हमें इसके मामले से क्या लेना देना??जो अपने पडोसी की सुरक्षा के बारे में नहीं सोच पाते ऐसे लोग क्या खाक देश के बारे में सोचेंगे??मुट्ठी भर अलगाववादियों ने कश्मीर के लाल चौक में ही तिरंगा फहराने पर आपत्ति की।क्यूंकि वो जानते है कि हमारी सरकार निकम्मी है!!और इस की जनता उससे बड़ी निकम्मी,जिसने ये सरकार चुनी है!!खैर मैंने छोटा मुह बड़ी बात कह दी अगर मेरी बात का आप लोगो को बुरा लगा हो तो मै आप सबसे माफ़ी चाहूँगा!!l

के द्वारा:

नवनीत जी मैंने तो अपने ब्लॉग में भी ये ही कहा की अगर ये राजनैतिक स्टंट है तो वो ही सही हमें फिर भी मिलकर इसका समर्थन करना चाहिए ... इस तरह बेशर्मी के साथ विरोध करना और हंगामा खड़ा करना पूरी दुनिया के सामने ये बताने के लिए काफी है की कश्मीर पर देश के राजनितिक दलों में ही एक मत नहीं है .. और सरकार के इस रवैये से पकिस्तान को भी एक बढ़िया मौका मिल गया ये साबित करने का की कश्मीर एक विवादित मसला है न सिर्फ उसके और भारत के बिच का .. बल्कि खुद भारत में ही .. क्योनाही सरकार ने अलगाववादियों के विरुद्ध जाकर इस यात्रा को समर्थन दिया ताकि उनके मन में भय होता की इस मुद्दे पर पूरा देश एक है मै भी आदरणीय डा. शंकर सिंह जी से सहमत हु .. अगर वोट बैंक की बात होगी तो सरकार संसद से भी तिरंगा उतर सकती है .. कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर सकती है

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

नवनीत जी, हमने आज वह स्थिति कर दी है की जिसको बाप, बेटा या पडोसी तक बनाना पसंद नहीं करते उसको देश की सत्ता दे देते है, देश का मुखिया बना देते है. और जिसने अपनी चड्ढी उतार दी हो उससे हम तिरंगे के उतरने की चर्चा कर रहे है. नवनीत हम जड़ों पर प्रहार न कर शिखर पर उस्तरा चला रहे हैं. जागना हमें होगा देश हमारा है. कितना हास्यास्पद लगता है की पहले हम खुद एक बलात्कारी को घर का बाप बनाते है वही घर की बहु बेटियों की इज्ज़त लूट लेता है फिर हम उसी से विरोध करने लगते है. नवनीत सुधार के लिए जहाँ से इलाज़ शुरू करना है हमें वहां से शुरू करना होगा वरना ऐसे लिख लिख कर कलम तोड़ भी देंगे कुछ नहीं होने वाला. हम खुद मानसिक रोगी हो जायेगे

के द्वारा: gopalji54 gopalji54

नवनीत सिंह जी अपने अच्छा ब्लॉग लिखा लेकिन कुछ बातो पैर मेरे जैसे आम आदमी की फ़िक्र में यह मुद्दा क्यों नहीं प्राथमिकता आम लोगो के बसस का हिस्सा बना? आखिर हमें यह पूछने का मौका कब आयेगा? आखिर हमारे दिए आम जनता के टैक्सों से उन्हें ६३ सालो से इसी दिन के लिए पला जा रहा है, की आम जनता को अपना सम्बैक अधिकारों के लिए बल पूर्वक रोका जायेगा, प्रश्न इसका नहीं है कि कौन विरोधी दल क्या केर रहा है यह उनका अधिकार ही नहीं कर्तव्य भी है ? लेकिन हम आम लोग जो महगाई,भूख,दवा के बगैर सरकारी खजाने में भरते है उन्हें ये पढेलिख--मानसिक रूप से हीन लोग अपनी हीन भावना के चलते आम लोगो और अभावग्रस्त लोगो पैर खुद मौज उड़ाते हुए सिर्फ इसके उसके में मूल प्रश्नों से मुह चुराते है आखिर क्यों नहीं सवाल उठाया जाता कि उस गुन्द्दे अलगाववादी को सीखचों के पीछे क्योनही बंद किया गया जो कि संविधान के अनुसार आवश्यक था क्यों कि सवाल गद्तंत्र दिवस का था और उसी दिन संविधान कि मर्यादा के लिए भी होना यही चाहिए था इस पैर प्रश्न उठाने वाले ये होते कौन है क्या ये उस जनता के लिए आवाज उठा रहे है जो देश की ७७% है और २० रूपये प्रति दिन से टैक्स भर रही है. तुम लोगो के लिए यह घ्रिडित मानसिकता विलाशिता का सवाल है. आखिर जब प्रधान मंत्री द्वारा स्वायतत्ता का प्रश्न उठा दिया है और बहस कि गुंजाईश ही नहीं रही और नाटो किसी तरह की मर्यादा का सवाल ही कहा जब आजादी के फलस्वरूप मिले गदराज्यके अवसर पैर हमारे लोकतंत्र के नेता विरोधी दल राज्य सभा और लोकसभा गिरफ्तार किये जाय इससे भी शर्मनाक बात किसी लोक तंत्र में संभव है तो फिर किस बात का लोक तंत्र सिर्फ अपने अको को उजाड़ केर निरीह आदिवासियो के नर्संघर के लिए त्वरित बल वाली सर्कार क्या चाँद मवालियो के दबाव में एक राष्ट्रिय त्याहार पैर रोक लगाने के स्थान पैर अपनी सुरच्चा में ल्यो नहीं झंडे का स्वागत करते हुए समारोह संपन्न कराते ग्द्तंत्र दिवस को देखते हुए स्वाभाविक रूप से व्यवस्था रही होगी. यहाँ प्रशन ये उठता है कि मुद्दा कौन बना रहा है राजनीत कौन केर रहा है? वे लोग जो तमाम तरह के घूप्ले घोटालो तथा स्विस बांको के पैसो को व्यवस्थित करने में लगे लोग ही मामले तो टूल दे केर एक राष्ट्रिय आपदा की तरह प्रचारित केर कौन राजनीत केर रहा है वह भी दिखाई दे रहा है और साथ ही दिखाई दे रहे है बहुरुइए दलाल जो इसी तरह से जोक की तरह आम आदमियो का खून चीस केर लिखने वाले दलालों को पालते है.

के द्वारा:

नवनीत जी नमस्कार, मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं जिन्होंने यह कहा कि सिर्फ राजनीतिक स्टंट है.. क्या उन्होंने कभी कश्मीर  के मूल नागरिकों की कोई फिक्र की..? यही मूल मंत्र है की जब कोई रेली होती है तो एक दिन हो जाती है और यह ड्रामा १३ दिन चला . रहा सवाल संसद पर तिरंगे का, उस पर जब हमला हुआ था तब सब एक थे एक साथ कुछ करना चाहिए था ? मूल मुद्दों से हटकर देश में राजनीत नहीं की जा सकती. . कुछ लोगो को भ्रम हे की वह देशभक्त है और वाकी सब देश द्रोही यही कारण है अमन का दिया सिर्फ झिलमिल कर रहा है जल नहीं रहा है और अविश्बाश पनप रहा है. इसका खामयाजा उठा रहा है आम आदमी जो रोजी रोटी के लिए तरस रहा है जिनकी संताने इस में होम होती है वह ही जानता है दर्द की किसी के खोने का दर्द क्या होता है.? बदिया है. बधाई हो.

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शैलेन्द्र जी शायद आपको पता नहीं कि कश्मीर की समस्या जिस समय की है उस समय भी कांग्रेस की ही सरकार थी और एक सवाल कि क्या कल को अगर अलगाववादी ये कह दें कि संसद भवन से तिरंगा हटा लिया जाए तो क्या हटा लिया जाएगा.? क्या अलगाववादी कश्मीर का पाकिस्तान में विलय की मांग करें तो क्या कर दिया जाएगा..? जहां तक रही जीके की बात तो जीके के नजरिए से बताइये कि क्या कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है..? एक और सवाल पूछना चाहूंगा कि क्या कश्मीर राजनीतिक मुद्दा नहीं है। अब तक कश्मीर के मुद्दे को राजनीतिक ढंग से ही सुलझाने के प्रयास किए गए है। हम यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि कश्मीर पर राजनीति ठीक नहीं। मेरा मानना है कि इस समस्या के लिए कांग्रेस और भाजपा के साथ वे सभी दल जिम्मेदार है, जिन्होंने कश्मीर की समस्या को हल करने की ठोस पहल नहीं या फिर हल की मांग नहीं की अथवा इस मुद्दे को संसद में नहीं उठाया। बहरहाल मेरा उत्साहवर्धन के लिए आपका शुक्रिया।

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navneet ji aapke josh purn aalekh ko dekh kar lagaa ki gk se dur hai. desh me kashmeer kaa mudda ab kaa nahee hai. iske liye sirf ek partee ko dosh dena theek nahee hai. hamaree aadat ban gayee hai ki ham har kaam me raajneet kar rahe hai. kabhee shanti or sanyam se soch kar to dekhiye ki pichhle kitne saalo dusree sarkaare rahee hai unke piryaas kayaa rahe hai? maan liyaa ki kongres ne kuchh nahee kiyaa par six year bjp kee sarkaar rahee or unke karkaal me kandhar sareekhe kaand huye. shekh abdulla ke saath milkar sarkaar chalai shekh abdulla ka dal ek nda ka ghatak tha. kyo nahee sambidhan me badlaab kiye. abhee abhee kashmeer six month dango me jhulsaa hai. to jaruree hai ki dowaaraa dango me jhonk de. kaam karne ke liye or bhee jawalant samisyaa hai jaise rozgaar bhrastaachar or khun peetee naukarshahee. aaj to logo ko aadat pad gayee hai ki ruling govt. ko kosho or raajneet karo. ek baar dhara 370 ke khilaaf bhee sansad mat chalne do gareevee ke khilaf ladai lado bhukhmaree or bhrast raajneet ke khilaaf laamband ho kar dikhao. yadi ham inhee bhawnaao me bah kar chalte rahe to rupam sareekhee woman paida hotee rahengee or jain sareekhe ias paida hote rahenge.un par lagaam kab lagegee. jhandaa to matra stant hai maksad ko dekhiye. kya aap chahte hai desh me aman shanti kharav ho. in netao ko sudharo inkee koi neet or disa nahee rahee hai wahee yaduraapaa kaa bachav karte hai or wahee shibbu soren ke sath sarkaar chala rahe hai jinkee griftaaree ke baad sansad nahee chalne dee thee is vipaksh ne. to dohree neet to netaa chal rahe hai jantaa inke peechhe pagal ho rahee hai. laal chowk ek dalaal street ban gayaa hai sahee hai. imandaaree se kaam nahee karne kaa nateeza yeh laal chowk. jawlant prakarn par josh purn lekh ke liye vadhai.

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एक विचारणीय ब्लॉग है. परन्तु इस बात को मद्देनज़र रखना होगा कि कश्मीर एक ऐसी समस्या बना दी गयी है जिस का हल शायद के पी एस गिल बचते हैं. जैसा पंजाब का हल निकला गया था. शायद कश्मीर का हल कोई निकलना नहीं चाहता. यह महसूस मुझे मेरी कश्मीर यात्रा के दौरान हुआ जब वहां में सुरक्षा कर्मियों से मिला और उनके विचारों से अवगत हुआ. तिरंगा तो दूर कि बात है कई जगहों पर बोर्ड पर शायद इंडिया के नाम को दर्शाना उचित नहीं पाया गया सो कुछ संसथानों के बोर्ड जिनके नामों में इंडिया शब्द आता है मिटे या कहिये तो मिटाए हुए थे. पेट्रोल पुमप पर बनी एक स टी डी बूथ पर मैंने एक कश्मीरी युवक से पानी पीने के लिए माँगा तो उसका जवाब था - यह कश्मीर हमारा है यहाँ इंडियन के लिए कुछ भी नहीं. मुझे लगा कोई कट्टर विचारधारा का पीड़ित होगा और मैंने हंस कर जवाब दिया - दोस्त हमारा तो कुछ नहीं सब कुछ तुम्हारा है अगर मनो तो, नहीं तो सिर्फ मेरा तेरा. वह कुछ बडबडाता हुआ चला गया पर एक ग्लास पानी नहीं दिया. दूसरा वाकया ठाट कि मैंने cherry का भाव पुछा तो दुगना रेट था मैंने उससे फिर आग्रह किया दोस्त ऐसा क्यों लोकल से कम और मुझ से दुगना ऐसा क्यों? जवाब था तुम लोग इंडियन हो....... मेरा एक सवाल है जो शायद आप के ब्लॉग का उत्तर देगा - इन सब से वहां के लोगों में जो घृणा है वह सिर्फ कश्मीर समस्या को हल न करना जिससे कट्टरवाद को बल milta है, का natija है . इन सब का एक हल है solve कश्मीर issue .................. hum सब को यह yad रखना है कि bharat vote bank कि rajneeti न ban कर reh jaye सिर्फ कुछ vote कि khatir...

के द्वारा:

माना की सरकार ने ही उन जवानों को भेजा है लेकिन जिस तरह की सुख सुविधा हमारे शहीद जवानों के परिवार वालो को मिल रही है शायद उस बात से कोई भी वंचित नहीं है!! हमारे देश में जान से ज्यादा खेलो में मिले पदक कीमती है!!मै सभी लोगो से पूछना चाहता हूँ कि अभिनव बिंद्रा को स्वर्णपदक के लिए एक करोड़ रुपये मिले!!लेकिन अगर हमारे जवान देश कि सुरक्षा करते करते शहीद हो जाते है तो उनके परिवारों वालो को जो सुविधाएँ प्रधान कि जाती है क्या वो काबिलेतारीफ है??सारे जवान इस बात का ज्ञान रखते है!!फिर भी वो देश के लिए अपने परिवार से दूर है!!अपनी प्राणों की परवाह न करते हुए ,भारत माँ की सुरक्षा कर रहे है!!! ऐसे जवानों को मेरा शत शत प्रणाम जय जवान

के द्वारा:

झंडा फहराने को प्रत्येक भाजपा कार्यकर्ता यह कहते नहीं थकता की यह अधिकार उन्हें संविधान ने दिया है और सुप्रीम कोर्ट ने भी समर्थन किया है की कोई भी भारतीय भारत भर में कहीं भी राष्ट्रीय ध्वज को फहरा सकता है तो भारतीय जनता पार्टी के सभी कर्ता-धर्ताओं से क्या यह आशा की जा सकती है की वह दिल्ली - उत्तर प्रदेश की सीमा पर गाजी पुर जहाँ गन्दगी का पहाड़ बना है वहाँ पर भी राष्ट्रीय ध्वज को एक बार तो फहराए और बताएं की वहाँ पर राष्ट्रीय झंडे को फहराने पर उसका अपमान होगा या सम्मान होगा चूँकि वह भी तो भारत भूमि का ही एक हिस्सा है वैसे आपका कथन------ वे कश्मीर और वहां के लाल चौक को भी अखंड भारत का हिस्सा मानते हैं, जहां कम से कम मैं तिरंगा फहरा सकता हूं….। इन्हीं शब्दों के साथ कश्मीर के लाल चौक में लहलहाता, चमचमाता, दमकता, खुली हवा में सांस लेता और अखंड भारत के गीत गाता तिरंगा देखने की कामना -----उचित ही है नोगेा

के द्वारा: s p singh s p singh

प्रणाम भैया सच तो ये है कि हमारा देश आजाद होने के बावजूद भी कांग्रेस का गुलाम है..आजादी क्या होती है इन्हे कांग्रेसियों को क्या मालूम?आजादी क्या होती है ये तो उन परिवारों से पूछिए जिन्होंने अपना बेटा,पति और भाई इस देश के लिए कुर्बान किया है!अपने परिवारों की बलिदानी दे कर उन लोगो ने हमें आजादी दिलाई है!ये कांग्रेस तो सिर्फ कश्मीर जैसे स्वर्ग को अपने राजनीती का अखाडा समझती है!! अलगाववादियों तो इस देश के नहीं है अगर होते तो राष्ट्रध्वज फहराने में उन नौजवानों कि मदद करते न कि उन्हें रोकने की सोचते!लेकिन सवाल अलगावादियों का नहीं नेताओ को क्यूँ रोका गया इस का है???सीधी सी बात है कांग्रेस नहीं चाहती कि सेना कश्मीर को पूरी तरह से अलगावादियों से छुड़ा ले!कश्मीर के छोटे से छोटे हिस्से को भी हमारे जवानों ने अपनी जान पर खेल कर और कुछ जवानों ने अपनी जान दे कर छुड़ाया है!और हमारे अंदर इतनी हिम्मत नहीं कि हम राष्ट्रध्वज फहरा सके??? अगर नौजवानों ने ठान लिया कि राष्ट्रध्वज फहराना है तो वो फहरा के रहेगें!!आखिर वो इसी भारत माँ के लाल है!उन्हें कोई नहीं रोक सकता!! जय हिंद जय भारत वन्देमातरम

के द्वारा:

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सादर प्रणाम राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटाले, कश्मीर की समस्या, असम में मारे जा रहे हिंदी भाषियों की समस्या और अयोध्या की समस्या के आगे राखी सावंत का इंसाफ…बिग बास.. जैसे किसी भी रियलिटी शो का कोई अस्तित्व नहीं है..ये सारे रियलिटी शो सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने के लिए होता है..अभी कुछ समय पहले "राखी का स्वयंवर" नाम का एक रियलिटी शो चल रहा था जिसमे राखी सावंत अपने लिए दूल्हा खोज रही थी... उन्हें दूल्हा तो मिला लेकिन उन्होंने सगाई करके छोड़ दिया .जो व्यक्ति खुद का इन्साफ नहीं कर सकता वो एक अरब की आबादी वाले देश का क्या इन्साफ करेगा???.. और रही सरकार की बात तो सब अपना वोट बैंक बचाने में लगे होते है..चाहे वो भाजपा हो या कांग्रेस .....कौन पार्टी जोखिम मोल लेगा...मेरा अपना मानना है की सारी राजनीतिक पार्टियाँ किसी भी धर्म संप्रदाय से जुडी नहीं होती!!!उनको सिर्फ अपना वोट दिखाई पड़ता है...जनता देखती है और कहती है कि फला हिन्दू नेता अच्छा है वो तो मस्जिद में चादर चढाने गया था.. फला मुस्लिम नेता अच्छा है वो तो मंदिर में फूल चढाने गया था..पर इस सच के पीछे दूसरा सच भी जुड़ा होता है..वो इसी बहाने अपना वोट बढ़ाने है.और मुस्लिमो के सामने जाकर हिन्दुओ की बुराई और हिन्दुओं के आगे जाकर मुस्लिमो की बुराई करते है..जब तक ऐसे ही जनता मूकदर्शक बनी रहेगी तब तक हमारा देश कभी विकसित नहीं हो सकता...कभी नहीं..

के द्वारा:

नवनीत जी......... आपके प्रश्न कश्मीर की समस्या बिग बास या राखी सावंत से बड़ी है..? असम में मारे जा रहे हिंदी भाषियों की समस्या राखी सावंत या फिर बिग बास से बड़ी है..? क्या राष्ट्रमंडल खेलों में हुए घोटाले बिग बास या फिर राखी सावंत से बड़े है..? क्या टू जी स्प्रैक्ट्र में हुआ घोटाला बिग बास अथवा फिर राखी सावंत से बड़ा है..? क्या अयोध्या में, जो भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है, जहां मंदिर बनाने की बात रही है, जहां स्वामी रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे लोग भगवान श्रीराम की जन्मस्थली होने की बात कहते हैं वो बिग बास या फिर राखी सावंत से बड़ा है..? वास्तव में राखी सावंत और बिग बॉस उन सभी मुद्दों से बड़े हैं जिनका उल्लेख आपने ऊपर किया है.......... क्योकि उन सभी मुद्दों से राजनैतिक हित अहित जुड़े हैं......... और किसी भी मुद्दे को छेड़ कर केंद्र सरकार अपने वोट बैंक को तोडना नहीं चाहती.......... घोटाले की जाँच में अपने ही दोषी पाए जाने तय हैं............ तो इससे तो सरल बात यही है की आप उन विषयों को चुने जिनसे आपको कोई अहित नहीं है और जनता जिनपर खुश भी रहे............. अच्छे लेख व सटीक प्रश्नों से भरे लेख के लिए हार्दिक बधाई...............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

महोदय आप को धन्यवाद एक गंभीर विषय को उठाने के लिए, वैसे तो मेरा भी जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही हुआ है लेकिन मेरे पूर्वज भी इसी क्षेत्र के रहने वाले थे \ इससे यह साबित नहीं होता की मैं जो कहूँगा वह सब सच होगा इस अयोध्या के दर्द को झेलने वाले पुरे भारत के लोग हैं \ हाँ अगर किसी को दर्द नहीं होता तो वह लोग हैं भारत के राजनितिक पार्टियों के नेता तथा सत्ता में बैठे लोग. यहाँ मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं है की भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी भावुकता में लास्ट समय में कदम उठाया है आखिर उसे जल्दी क्या थी स्टे देने में मुकद्दमा तो कल यानि हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में ही आना था \ रही बात आपसी सहमति की तो आपसी सहमति कौन करेगा यहाँ तो दोनो ओर के करोडो लोग हाथो में अपने -अपने हथियार लिए खड़े हैं आज एक त्रिपाठीजी आयें हैं कल हजारों और आ जायेंगे तथा दूसरी ओर से हजारो जिलानी या अच्छन मियां आ जायेंगे इसका अंत कहां होगा कोई नहीं जनता \ हाँ एक सुझाव भी देना चाहूँगा की प्रधान मंत्री जी को आगे आकर मुसलमान भाईयो से एक अपील करनी चाहिए की देश हित में वह इस बाबरी मस्जिद से दावा छोड़ दें तथा वहां पर सरकारी खर्च से एक राम मंदिर और एक मस्जिद का निर्माण के साथ-साथ एक भव्य अस्पताल का भी निर्माण करा दे .................

के द्वारा:

बड़े भाई नवनीत जी को सादर नमस्कार, भाई साहब आपने जो भी लिखा सही ही लिखा है, मैं नहीं जानता कि त्रिपाठी जी किस वजह से इस फैसले को टालना चाहते है पर इतना जरूर कहना चाहूँगा कि उनकी चिंता उतनी नाजायज भी नहीं है जितना कि लोगो को लग रहा है। कामनवेल्थ गेम्स और बाकि सब समस्यायें तो अपनी जगह है ही लेकिन मेरी चिंता कि वजह तो कुछ और ही है। मै हर तरह से माननीय न्यायालय के फैसले का सम्मान करता हूँ और देश के हर नागरिक से यह अपील भी करता हूँ कि वह फैसले का सम्मान करे लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि जिस स्थान पर भगवान राम विराजमान है और उनकी नियमित पूजा अर्चना भी हो रही है, उस स्थान पर क्या और कुछ भी हो सकता है? क्या किसी भी पक्षकार के हक में फैसला आने पर उस स्थान के स्वरुप में सिवाय उसे भव्यता देने के और कोई बदलाव भी हो सकता है?और क्या इस देश की जनता उसे मन से स्वीकार कर पायेगी? मेरे विचार से श्री त्रिपाठी जी की पहल को सदभाव से लेना चाहिए, माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी शायद इन्ही सब चिंताओं को ध्यान में रखते हुए फैसले को लंबित करते हुए उस पर विचार करने की सोची है। मै फिर कहना चाहूँगा की आपसी प्रेम से कानून बनाकर यदि कोई रास्ता निकाल लिया जाये तो वह सबसे बेहतर होगा। ताकि इस देश की जनता एक दुसरे से प्रेम से कह सके कि “न तुम जीते न हम हारे”

के द्वारा:

बड़े भाई नवनीत जी को सादर नमस्कार, भाई साहब आपने जो भी लिखा सही ही लिखा है, मैं नहीं जानता कि त्रिपाठी जी किस वजह से इस फैसले को टालना चाहते है पर इतना जरूर कहना चाहूँगा कि उनकी चिंता उतनी नाजायज भी नहीं है जितना कि लोगो को लग रहा है। कामनवेल्थ गेम्स और बाकि सब समस्यायें तो अपनी जगह है ही लेकिन मेरी चिंता कि वजह तो कुछ और ही है। मै हर तरह से माननीय न्यायालय के फैसले का सम्मान करता हूँ और देश के हर नागरिक से यह अपील भी करता हूँ कि वह फैसले का सम्मान करे लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि जिस स्थान पर भगवान राम विराजमान है और उनकी नियमित पूजा अर्चना भी हो रही है, उस स्थान पर क्या और कुछ भी हो सकता है? क्या किसी भी पक्षकार के हक में फैसला आने पर उस स्थान के स्वरुप में सिवाय उसे भव्यता देने के और कोई बदलाव भी हो सकता है?और क्या इस देश की जनता उसे मन से स्वीकार कर पायेगी? मेरे विचार से श्री त्रिपाठी जी की पहल को सदभाव से लेना चाहिए, माननीय उच्चतम न्यायालय ने भी शायद इन्ही सब चिंताओं को ध्यान में रखते हुए फैसले को लंबित करते हुए उस पर विचार करने की सोची है। मै फिर कहना चाहूँगा की आपसी प्रेम से कानून बनाकर यदि कोई रास्ता निकाल लिया जाये तो वह सबसे बेहतर होगा। ताकि इस देश की जनता एक दुसरे से प्रेम से कह सके कि "न तुम जीते न हम हारे"

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आदरणीय अशोक जी मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूं। आपने पंजाब समेत तमाम इलाकों में हिंदी भाषियों के साथ हो रहे सलूक की चर्चा की, आपने कश्मीर, नक्सलवाद और कामेनवेल्थ गेम पर चिंता जताई, यह अच्छी बात है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि इस हालात के लिए जिम्मेदार कौन है और सुधार की शुरूआत कब और कहां से होगी..? क्या किसी विषय को ठंडे बस्ते में डाल देना ही उसका हल है..? और प्रासांगिक विषय को लेकर  जिन रमेश चन्द्र त्रिपाठी की भावनाओं की बात आप कर रहे हैं वे इतने दिनों तक क्या कर थे..? और सबसे बड़ी बात ये एेसा मौका था, जब फैसला सुनने को हिंदू औप मुस्लिम दोनों पक्ष राजी थे। इस विवाद की वजह अयोध्या-फैजाबाद को कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं, यह यहां के लोग ही जानते हैं। एक और बात अयोध्या-फैजाबाद के लोग आक्रामक नहीं, बल्कि अमनपसंद हैं। चाहे वह किसी भी धर्म अथवा जाति के हों..।

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नवनीत जी सादर अभिवादन, रमेश चंद्र त्रिपाठी जी की याचिका हमारे कपूरथला पंजाब में भी दैनिक जागरण का हिस्सा बनी थी। उसे पढ़ा भी था, लेकिन जेहन में एक बात लगातार मुझको कटोच रही थी कि आखिर श्री त्रिपाठी जी है कौन..। मेरा भी संबंध फैजाबाद की पावन धरती से है, जन्म फैजाबाद के सिविल अस्पताल में 1959 में हुआ था। मेरे मौसा-मौसी नवाब गंज गोंडा में रहते है, उनसे मिलने जब भी गया..वाया अयोध्या ही जाता था। एक समय था, जब सरयू को पार करने के लिए स्टीमर या नाव का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन पुल बनने के बाद इससे छुटकारा मिला। अयोध्या मामले का हर संघर्ष को मैंने 1999 तक देखा है। 1992 में मैं भी इत्तफाकन वहां पर कवरेज के लिए गया था, पेपर साप्ताहिक था नाम था लोक अभियोजक । आपने श्री त्रिपाठी जी के संदर्भ में जो प्रश्न उठाए है..वह आपके राष्ट्रवादी होने का परिचायक है। फैसला तो जब भी आएगा अपना रंग जरूर दिखाएगा। भले ही इंसानी खून की नदिया भी उफान भरे। देश के और क्षेत्र (फैजाबाद) के मुसलिम संप्रदायों में अब पहले से ज्यादा ही आक्रामकता आ चुकी है। नकस्सल और आतंकवाद पूरी तरह से पैर पसार चुके है। और सिर पर है कामनवेल्थ गेम को सुरक्षित तरीके से संपन्न कराने की सारे राष्ट्र की जिम्मेदारी। वैसे भी निमाणर्कायर् को लेकर पहले से ही सारी दुनिया में भारत की नाक कट रही है। विदेशी खिलाड़ी और दशर्क आने से कतरा रहे है। ऐसे में अगर श्री राम जन्म भूमि मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद के तेरह के चक्कर में पड़कर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठते है, तो उसका हश्र क्या होगा। पािकस्तान तो इसकी फिराक में पहले से ही बैठा हुआ है। अगर श्री त्रिपाठी ने इस मुद्दे को उठाया है तो इसे राजनीति के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। राष्ट्रीय भावना कभी भी किसी के मन अचानक भी अंगड़ाई ले सकती है। इसलिए श्री त्रिपाठी जी को कांग्रेसी मानकर उनके प्रयासों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, यह समय की सख्त मांग है। अच्छा तो होगा अभी भी दोनों संप्राय के लोग आपसी समझौते के तहत इस मामले को निपटा ले तो देश और धमर् दोनों का ही कल्याण इसी में निहित है। नही तो आगे भी सुप्रिम कोटर् का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। अब निणर्य अगर कामनवेल्थ गेम के संपन्न होने के बाद आए तो ज्यादा अच्छा होगा। वक्त है किसने क्या प्रतिक्रिया दी है..इस पर बहस नहीं करने की। चिंता इस बात की करनी चाहिए की कैसे भी हो सांप्रदायिक दंगे पर लगाम कसी जाए। गौरलब है कि मौजूदा उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार कई अर्थों मुसलिम परस्त है, क्योकि यह उसका वोट बैंक है। और कोई भी राजनीतिक दल अपना वोट बैंक खराब नहीं करना चाहता है। भले ही तुष्टीकरण की नीति के चलते देश कई टुकड़ों में बंट जाए। हिंदू वगर् माया वती को मुलायम सिंह से कम खतरनाक नहीं मान रही है। वहीं मुलायम सिंह था, जिसने कारसेवकों पर गोलियां चलवाई और बाद में इसने उस पूर्व मुख्यमंत्री से गंठजोड़ किया जिसके मुख्यमंत्रित्तव काल में कार सेवकों ने विवादित धामिर्क पर्रतीक को धूलधूसरित कर दिया था। यह तो रही राजनीति की बात..अब इसके बाद भी हम लोग श्री त्रिपाठी जी जैसे कुछ लोगों के प्रयासों की अगर इसी तरह से खिल्ली उड़ाते रहे अथवा अनाप शनाप प्रतिकऱिया व्यक्त करते रहे तो देश कभी भी एक नहीं रह पाएगा। जफरयाब और अन्य बहुत से नेताओं को मैं जानता हूं.ये सब अवसरवादी लोगों की जमात है। .पंजाब में पत्रकारिता कर रहा हूं..ऐसे तत्वों से मेरा हरदम सामना हो रहा है। पंजाब में यूपी बिहार अथवा हिंदी भाषी लोगों के साथ जो भी कुछ हो रहा है, वह कम चिंता जनक नहीं है। कश्मीर की तजर् पर पंजाब में भी चार साल पहले गैर पंजाबी भाषी को निकालने की मुहिम शुरू करने का प्रयास किया जने की तैयारी थी, लेकिन जब इन सरदारों को 1984 के दंगे की याद आई तो सब कुछ थम गया। मसलन हम लोग जूते के आदमी है..प्यार और सहानुभूति को हम लोग कायरता समझते है। इस मामले पर कोर्ट का फैसला कोई आखिरी नहीं होगा। फैजाबाद के मुसलमानों में इसे लेकर कोई डर या दहशत नहीं है..वह हर स्थिति का सामना करने के लिए अभी से कमर कसे हुए है। ऐसा ही कुछ कट्टर मानसिकता के हिंदू भी तैयार है। तो ऐसे में श्री त्रिपाठी जी की भावनाए और चिंता पऱासांगिक है। उन पर अमल होना चाहिए।

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नवनीत भाई यहां धर्मनिरपेक्ष वही हो सकता है सनातन धर्म और उसके आराध्यों के खिलाफ विषवमन करे। उन्हें लगता है कि यदि सत्य होने के बाद भी यदि बोल दिया गया तो उनकी धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठने लगेगा। ये वही लोग हैं जो ईद मिलन में तो भाग लेंगे लेकिन भगवती जागरण में भाग लेने से परहेज करते हैं। ये वही लोग हैं जो एक सनकी पादरी द्वारा कुरान जलाये जाने की घोषणा करने पर छाती तो कूटते हैं लेकिन किसी पेरियार और मकबूल फिदा हुसैन द्वारा हिन्दू धर्मग्रथों और देवी देवताओं का अपमान करने पर उसे विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता करार देते हैं। इतना ही नहीं ऐसे कुंठित विचार व्यक्त करने वालों का विरोध करने वालों को आक्रामक और आतंकी तक करार दे देते हैं, तब विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की उनकी धारणा किनारे हो जाती है। ऐसे ही लोग श्रीराम के मुकाबले बाबर और उसके या उसके किसी सिपह सालार द्वारा बनवायी गयी मसजिद को महत्वपूर्ण मानते हैं। मगर उनकी समझ में यह नहीं आता कि अयोध्या श्रीराम और वहां के रहने वालों की है, श्रीराम उन सभी के हैं जो लोग समाज के लिये जीते और मरते हैं। जिनके लिये मर्यादित जीवन महत्वपूर्ण है।

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नवनीत जी, अगर कोई मुझसे धर्मनिरपेक्षता का अर्थ पूछे तो मेरा सीधा जवाब होगा कि यह एक गढ़ा हुआ शब्द है, जिसका कोई अर्थ नहीं होता । यदि आप किसी धर्म के सापेक्ष नहीं हैं, तभी तो निरपेक्ष हैं! आप निरपेक्ष हैं तो इसका सीधा अर्थ होगा कि आप नास्तिक हैं, आस्थावान हैं ही नहीं । फ़िर तो आपका मंदिर मस्ज़िद में जाकर पूजा इबादत करना भी ढोंग ही है, किसी पूजा पद्धति के प्रति सापेक्षता क्यों प्रदर्शित करते हैं? इसी प्रकार एक शब्द आता है 'सर्व धर्म समभाव' । क्या कोई एक व्यक्ति एकसाथ सभी धर्मों के प्रति समान भाव रख सकता है? यह भी ढोंग ही होगा । हर कोई अपने धर्म के प्रति भावुक और वफ़ादार होता है, समान भाव कैसे रख पाएगा । एक ही बात समझ में आती है, वह है एकदूसरे के धर्मों के प्रति सम्मान भाव रखने की । समाज में रहना है तो इस भाव को जीवित रखना अपरिहार्य है । हमारी हार्दिक इच्छा रहती है कि जैसे हम अपने पिता को सम्मान देते हैं, वैसे ही दूसरे भी हमारे पिता को सम्मान ही दें, हेय दृष्टि से न देखें । इसके लिये हमें भी दूसरों के पिता का सम्मान करना सीखना होता है, अन्यथा दूसरों के द्वारा पूजितों का अनादर करने से हमारे पूजित दूसरों के द्वारा कैसे सम्मानित रह पाएंगे? मेरी बात 'सर्व धर्म सम्मानभाव' के सापेक्ष है । अयोध्या प्रकरण से इसका कुछ भी लेना-देना नहीं है । दुनिया जानती है कि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या ही है, और राम सिर्फ़ हिन्दुओं की मिल्क़ियत नहीं हैं, बल्कि एक पद्धति हैं, एक जीवन दर्शन हैं, एक विचार हैं और पूरी दुनिया के लिये आराध्य हैं । अच्छे लेख के लिये बधाई ।

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ये तो सच है कि अयोध्या के राम मंदिर मुद्दे को लेकर बहुत सी राजनीतिक पार्टियों ने तमाम तरह की भाषणबाजी की| पर हुआ क्या ? राम मंदिर की समस्या आज भी जैसी की तैसी है| कभी राम के नाम पर बेचारी जनता के वोट को लेकर ठगा गया तो कभी हिंदुत्व के नाम पर कईयों की जाने गयी|एक बार फिर अयोध्या सुलगने को तैयार है|रिजल्ट अभी कुछ नहीं आया लेकिन सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी जा रही है|यहाँ तक की जो जज फैसला सुनायेंगे उनकी भी सुरक्षा कड़ी कर दी जा रही है|और हमारे महानुभाव नेता जी लोग तो पहले से ही कड़े पहरे में है|बचा कौन? हम आम जनता!!!!!फिर हम ही लोगो में से कोई मारा जायेगा!!!!फिर हम में से कोई जलाया जायेगा!!!!!फिर ये नेता लोग हिन्दुओं को मंदिर के नाम पर, मुस्लिमों को मस्जिद के नाम पर हमें ठगेंगे हम फिर तैयार रहेंगे!!!!बेचारी आम जनता!!!!!बेचारी अयोध्या!!!!!!बेचारे श्री राम!!!!!!

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सही कहा भैया आपने, मै बस से ऑफिस जा रहा था तो लखनऊ के ही दो लोग यही बात कर रहे थे जैसा आपके फ्रेंड सोनू जी पूंछ रहे थे!!!!इलेक्शन नहीं होगा,कर्फु लगेगा,मायावती ने केंद्र सरकार से इतनी बटालियन मांगी है उत्तर परदेश के लिए!!!अभी कुछ हुआ भी नहीं अटकलें पहले ही लगने लगी.यहाँ तक की वो लोग कह रहे थे की चलो कम से कम ऑफिस में छुट्टी तो रहेगी कर्फु की वजह से!!!सुनकर बड़ा ही दुःख हुआ की लोग क्या क्या सोचते है?????लोग सिर्फ छुट्टी के लिए कर्फु लग जाये ऐसा सोच रहे है, चाहे किसी की जान चली जाये या फिर देश को आर्थिक नुक्सान पहुंचे!!! उन्हें तो बस छुट्टी चाहिए!!!!आपका ये ब्लॉग ऐसे लोगो के मुह पर तमाचा है,जो इस तरह की घिनौनी बातें सोचते है!!!!

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